चलते चलते जीवन में, आएगा ऐसा भी पल..
जब तुम्हे लगेगा छोड़ गया, साथ तुम्हारा हर मंजर..
हर अपना लगेगा बेगाना, पहचाना चेहरा अनजाना ..
हँसी चिदाएगी तुमको, हर शब्द लगेगा तब ताना..
तब आँखें बंद कर लेना तुम, और हाथ पकड़ लेना मेरा..
समय-विमान में बेठेंगे, और भविष्य सैर पर निकलेंगे..
वो देखो वो घर हमारा है, आगे जिसके बगीचा है..
कितने रंगों के फूल यहाँ, भीनी खुशबू से महकता है..
ये फूल नहीं कोई साधारण, ये प्रेम-पुष्प हैं कहलाते..
प्यार की हलकी रिम-झिम से, ये चुपके चुपके खिल जाते..
अब ध्यान से देखो क्यारी में, वो पोधे नहीं वो रिश्ते हैं..
ऊपर से लगे भले ही अलग, पर जड़ों में जाकर मिलते हैं..
मुरली की धुन सुनी तुमने, वो आगे हमारा मन्दिर है..
छोटे से दिए की ज्योति में, दोनों लगते कितने सुंदर हैं..
बस आगे ही तो रसोई है, जहाँ प्यार मिले खाने में भी..
भोजन वही जो तृप्त करे, तन-मन को नहीं आत्मा को भी..
वो देखो तुम उस आँगन को, वहां बचपन खेला करता है..
अनुभवी गोद में सर रख कर, हर रात कहानी सुनता है..
अब उस झूले में बेठो तुम, ये हम दोनों का बंधन है..
प्रेम वफ़ा और आदर का, जो सम्पूर्ण समर्पण है..
इस पूरे घर को देखो तुम, क्या इससे अलग कोई सपना था..
जितना माँगा कहीं ज्यादा दिया, देने वाला जो अपना था..
चलते हैं अब हम वापस, थोडी जिज्ञासा रहने दो..
सब आज पता चल जाएगा, तो क्या रह जाएगा जीने को..
जब पाना ही है ये सब तो, क्यूँ आज ऐसे परेशान रहें..
चिंता की लकीरें मिटा के अब, क्यूँ ना चेहरे पर मुस्कान रहे..


